Electoral: पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले करीब 60 लाख से भी ज्यादा मतदाताओं के नाम अंतिम सूचि में अभी नहीं आए है जिसके चलते अभी करीब 8.5 प्रतिशत मतदाता की पात्रता की जाँच सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर नियुक्त अधिकारी कर रहे है। जब तक इन नामों को मंजूरी नहीं मिलती तब तक ये मतदाता मतदान में हिस्सा नहीं ले पाएगें। राज्य में शनिवार को अंतिम मतदाता सूची जारी होनी है, लेकिन बड़ी संख्या में लंबित मामलों ने चुनावी माहौल को संवेदनशील बना दिया है। Electoral
क्या है पूरा मामला Electoral voter list 2026

चुनाव प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची का विशेष रूप से पुनरीक्षण किया गया था। जिसके चलते निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी दतावेज़ों की जाँच कर नामों को स्वकृति दे रहे थे। लेकिन बाद में चुनाव आयोग द्वारा कई प्रविष्टियों पर आपत्ति दर्ज करवाई गई है। जिसके चलते कई नामों को फिर से जाँच के लिए भेज दिया गया है। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक 11 फरवरी के बाद से इन मामलों की संख्या बढ़कर अचानक 60 लाख तक पहुंच गई है। Electoral
इन जिलों में सबसे ज्यादा असर sir final list
जानकारी के मुताबिक अल्पसंख्यक बहुल जिलों में लंबित मामलों की संख्या अधिक है। इसमें मुर्शिदाबाद में लगभग 11 लाख मामले है जबकि मालदा में 8.28 लाख और दक्षिण 24 परगना में 5.22 लाख मामले लंबित है। उत्तर 24 परगना में करीब 5 लाख और झारग्राम और कालिम्पोंग में भी हजारों ऐसे मामले है। जानकरों के मुताबिक एक साथ इतनी बड़ी संख्या में मामलों का समीक्षा के लिए जाना काफी गंभीर चुनौती है। Electoral
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका
इन विवादों के बीच सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड के करीब 530 न्यायिक अधिकारियों को समीक्षा प्रक्रिया में शामिल किया गया है। इसी के चलते जब तक अधिकारी नामों को मंजूरी नहीं देंगे, अंतिम सूची में उनके आगे निर्णय के अधीन ही दर्ज रहेगा। जानकारों के मुताबिक न्यायिक निगरानी पारदर्शिता होना जरुरी है लेकिन एक साथ इतने मामलों की जाँच करना काफी कठिन कार्य है। sir
विवाद और राजनीतिक आरोप
राज्य की सत्ताधारी पार्टी ने सूक्ष्म प्रेक्षकों की नियुक्ति पर सवाल उठाए हैं और आरोप लगाया है कि इससे वैधानिक अधिकारियों के अधिकार प्रभावित हुए हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि दस्तावेजों में अनियमितताएं पाई गईं। कुछ मामलों में कथित रूप से संदिग्ध पहचान पत्र और अपलोड किए गए दस्तावेजों की जांच जरूरी थी। मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने स्थिति को असाधारण बताया है और कहा है कि न्यायिक हस्तक्षेप के कारण यह प्रक्रिया और जटिल हुई है।

