Ragni kalakar : किसी भी प्रतिभा के निखरने के लिए कोई विशेष स्थान तय नहीं है, बल्कि वह अपना मुकाम स्वयं बना लेती है। कवयित्री कमलेश गोयत पर यह बात पूर्णतया सटीक बैठती है। रोहतक जिले के छोटे से गांव बडाली में पली बढ़ी कमलेश गोयत वर्तमान में जींद जिले के ईगराह गांव के सरकारी स्कूल में अंग्रेजी की लेक्चरर हैं।
पच्चीस पुस्तकों का लेखन (Ragni kalakar)
कमलेश गोयत अब तक पच्चीस पुस्तकों का लेखन कर चुकी हैं। जिनमें नौ उपन्यास, हरियाणवी गजल संग्रह, हरियाणवी कव्वाली संग्रह, लोकगीतों पर समीक्षा ग्रंथ, हरियाणवी किस्सों और फुटकर रागनियों से सुसज्जित विस्तृत ग्रंथ कमलेश काव्य कुंज, हरियाणवी नाटक संग्रह, हिंदी कहानी संग्रह, हरियाणवी जनिका संग्रह शामिल हैं।
यह पुस्तक इंडिया बुक आफ रिकार्ड्स में शामिल (Ragni kalakar)
भारत की एकमात्र पुस्तक ‘भारतीय इतिहास काव्य ‘ जिसमें भारतीय इतिहास को काव्यबद्ध कर्मबद्ध किया गया है, उनकी यह पुस्तक इंडिया बुक आफ रिकार्ड्स में शामिल हो चुकी है। उनका समीक्षा ग्रंथ हमारे लोकगीतों में जीवन की हर धुन हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कृति से नवाजी जा चुकी है। इतना ही नहीं, अनेकों संस्थाएं इस लोक कवयित्री को इनकी श्रेष्ठ रचनाओं के कारण इन्हें सम्मानित कर चुकी हैं।

रागनियां में महारत हासिल (Ragni kalakar)
रागनियां की यदि हम बात करें, तो कमलेश ने मानो इनसे गहरा नाता ही जोड़ लिया है। उन्हें कैसा ही विषय दिया जाए या उनके हृदय स्पंदन से फूटे, वह झट से छंद घड़ देती है। उनकी रागनी में कोई अश्लीलता व फूहड़पन नहीं होता, बल्कि समाज को जागरूक करने का रुक्का होता है, जो ऊंचे स्वरों में व्यक्ति को मधुरता के साथ झकझोरता प्रतीत होता है।
जानिए यहां उनकी रागनियों के कुछ बोल (Ragni kalakar)
वह बहन, बेटियों को समझाती रागनी- धी लाडो कुछ ख्याल करो मां बाप नै देई आजादी जै मर्यादा लांघ देई तै हो ज्यागी बर्बादी, गाती दिखती हैं। तो कभी किशोरावस्था बारे- पीहर बडाली म्ह कुए पै नीर भरया कमलेश तनै, घरां बाप कै गिरकाई कोन्या राख्या सादा भेष तनै, गाती प्रतीत होती हैं। दहेज लोभियों पर प्रहार करते हुए वह कहती हैं- भला आदमी ब्याह शादी का मोल कदे करै नहीं, जिसकै रड़क दहेज की उनै कुछ चीजां तैं सरै नहीं। जमीन से जुड़े रहने के बारे में उनका कहना है, सैक्टर के म्हा कोठी तेरी ना करिए घर बिराणा, देखैं बाट गाल गाम की राखिए आणा जाणा।

