Success Story : उनका बचपन गरीबी में बीता। मजदूरी करते हुए खेतों में कपास चुगाई का काम किया। घर में लाइट नहीं थी, इसलिए दोस्तों के घर जाकर पढ़ाई की। आज वो इस मुकाम पर हैं कि युवाओं को रोजगार दे रहे हैं। हम बात कर रहे हैं हरियाणा के जींद जिले के दुर्जनपुर के गांव के महेंद्र सिंह भट्टी की। महेंद्र सिंह मिंडा कार्पोरेशन लिमिटेड में बिजनेस हेड और वाइस प्रेसिडेंट के तौर पर काम कर रहे हैं। पांच प्लांट संभालते हैं।
मिंडा कार्पोरेशन लिमिटेड कंपनी भारत की एक प्रमुख आटोमोटिव कंपोनेंट (वाहन पुर्जे) बनाने वाली कंपनी है और विश्व स्तर पर आटोमोबाइल उद्योग को पुर्जे सप्लाई करती है। यहां तक पहुंचने के लिए उन्हें (Mahendra Singh Bhatti) काफी संघर्ष करना पड़ा। बचपन गरीबी में बीता।
पढ़ने के साथ खेत में मजदूरी की, फेरी लगाकर सब्जी व कपड़े बेचे। पिता चंदगी राम भट्टी के पास खुद की जमीन नहीं थी। साझे पर खेत लेकर खेती करते थे। लेकिन इससे परिवार का गुजारा संभव नहीं था। खुद का मकान भी नहीं था। पढ़ने के लिए भी बिजली की सुविधा नहीं थी। महेंद्र (Mahendra Singh Bhatti) दोस्तों के घर जाकर पढ़ते थे। पढ़ाई में काफी होशियार थे। पहली से 10वीं कक्षा तक स्कूल में प्रथम रहे। पांचवीं कक्षा में जिले में 19वें स्थान पर रहे और स्कालरशिप मिली।

Success Story : 80 रुपए 85 किलो कपास चुग लेते थे
आठवीं कक्षा में भी स्कालरशिप मिली। वे खेतों में मजदूरी करते थे। कपास चुगाई करते थे। पांच किलो कपास चुगने के दो रुपये मिलते थे। छुट्टी वाले दिन 80 से 85 किलो कपास चुगाई कर देते थे। नाली सफाई का काम करते थे। गांव में स्कूल का निर्माण चल रहा था। बजरी का ट्रक आता, तो अकेले ही रात को ट्रक को खाली करते थे। ट्रक से बजरी उतारने के 50 रुपये मिलते थे। इस काम में सारी रात निकल जाती थी और शरीर बुरी थक जाता था। नचार गांव का एक पशु व्यापारी था।
वो आसपास के गांव से भैंस खरीदता था और पर्ची पर पता लिखकर महेंद्र (Mahendra Singh Bhatti) के पिता को दे जाता था। महेंद्र बताए पते से भैंस लेकर नचार गांव में व्यापारी के घर छोड़कर आते थे, जिसके पांच रुपये मिलते थे। व्यापारी की पत्नी भैंस बांधने के बाद एक गिलास दूध और दो रोटी खाने के लिए देती थी। कई बार तो कटड़े को कंधे पर बैठाकर ले जाना पड़ता था। मेहनत- मजदूरी से कमाए पैसे से पुरानी किताबें खरीदते, ड्रेस व स्कूल फीस का खर्च निकालते।
परीक्षा के बाद उन पुरानी किताबों को उसी रेट पर बेच देते। आठवीं के बाद कुछ दिन छुट्टियां रहती थी, तो उचाना में बाग से अंगूर खरीदते और साइकिल पर उनको बेचकर प्रतिदिन 10 से 15 रुपये बचाता था। 1987 में 10वीं कक्षा पास की।

Success Story : 10वीं की परीक्षा के बाद दुकान की, बचत के पैसों से आगे दाखिला लिया
10वीं की परीक्षा के बाद एक व्यक्ति से 500 रुपये उधार लिए और पड़ोस में एक दुकान किराये पर ली। जब तक 11वीं कक्षा शुरू हुई, तब तक दुकान से करीब 2600 रुपये बचा लिए। 11वीं कक्षा में इस पैसे से दाखिला, किताबें व ड्रेस की व्यवस्था की। इस दौरान साेनीपत इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला हो गया।
घर आने का भी किराया नहीं होता था, इसलिए घर आने की बजाय छुट्टियों में भी हास्टल में रहते थे। अप्रैल में जब छुट्टियां हुई, तो किसी से तीन हजार रुपये उधार लेकर सोनीपत में लगी सेल से पेंट- शर्ट खरीदी। गांव में आकर ये पेंट- शर्ट साइकिलि पर फेरी लगाकर बेची। जिससे अगले सेमेस्टर की फीस, हास्टल खर्च व ड्रेस का खर्च बच जाता था। जब अंतिम वर्ष की पढ़ाई चल रही थी, तभी गुरुग्राम की एक कंपनी में चयन हो गया।
Success Story : कमरे पर पंखा नहीं था, फैक्टरी में देर तक रहकर काम किया
गुरुग्राम में जहां किराये पर जगह ली थी, वहां पंखा भी नहीं था। इसलिए देर तक फैक्टरी में ही रहकर काम करता रहते थे। अच्छी तरह काम सीख गए, तो दूसरी फैक्ट्रियों में भी जाकर काम करने लगे। जिसमें मेंटेनेंस, ड्राइंग बनाना, कंपोनेंट्स का निरीक्षण शामिल रहता था। घंटे के हिसाब से पैसे मिलते थे। उसके बाद कंपनियों में छोटे- मोटे ठेेके लेने लगे। रविवार को भी कंपनियों में जाकर काम करते थे। आगे बढ़ने का जुनून था। मां व दादी ने सीख दी कि मेहनत से पैसे कमाना है, चोरी- ठगी नहीं करनी है।

कंपनियों में मेहनत करने के साथ ही अपनी क्वालीफिकेशन भी बढ़ाते रहे। डिस्टेंस से पहले एमबीए की, फिर एमटेक की। इस दौरान अच्छी छवि बन गई थी, जिससे खुद कंपनियों के अच्छे आफर आने लगे। इस दौरान शादी भी हो गई। पत्नी खुर्शिदा भट्टी बड़े घर से थी। उन्होंने पूरा साथ दिया। उन्होंने बीए- बीएड की थी। वे एक निजी स्कूल में पढ़ाने लगी। बचत करके दोनों ने मिलकर धीरे- धीरे पैसे जोड़े। पहले बेटी, फिर बेटे का जन्म हुआ। जहां पत्नी पढ़ाती थी, उसी स्कूल में दोनों की पढ़ाई हुई। फिलहाल बेटी बैंक आफ इंडिया में सीनियर मैनेजर हैं और बेटा अमेरिका में एक कंपनी में जाब करते हैं।
Success Story : युवाओं को दिला रहे रोजगार
महेंद्र भट्टी ने बताया कि उन्होंने बचपन में आर्थिक परेशानी झेली है। उस समय गांव के लोगों ने उनकी बहुत मदद की। इसलिए वे जरूरतमंद युवाओं की मदद करते हैं। जब बेंगलुरु कंपनी के प्लांट में उचाना क्षेत्र से 50 से ज्यादा युवाओं को रोजगार दिलवाया। आज वे बड़े पद पर हैं, लेकिन जमीन से जुड़े हुए हैं।
अब भी कंपनी में जाकर मशीनें ठीक करते हैं। अमेरिका, जर्मनी, चीन सहित कई देशों में जा चुके हैं। उनकी पत्नी खुर्शिदा भट्टी जरूरतमंद बच्चों को निश्शुल्क पढ़ाती हैं। मां लिछमी की ईमानदारी व मेहनत से कमाने की सीख को कभी नहीं भूलते। बड़े भाई पारस, जिसने परिवार को चलाने के लिए खूब मेहनत- मजदूरी की, आज वे इस दुनिया में नहीं हैं।

